परंपरा और संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं कुम्हार, दीपावली पर दीयों की बिक्री से चलती है परिवार की आजीविका
संवाददाता : बरही
बरही (हजारीबाग): दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगती है। घरों और दुकानों को सजाने के लिए लोग तरह-तरह की तैयारियां करते हैं। लेकिन दीपावली की असली पहचान आज भी मिट्टी के दीयों से ही जुड़ी हुई है। कुम्हारों के चाक पर तैयार होने वाले मिट्टी के दीये इस पर्व की परंपरा और संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं।
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि दीये प्रकाश, पवित्रता, सुख-समृद्धि और अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक हैं। यही वजह है कि आधुनिक सजावट और बिजली की रंग-बिरंगी लाइटों के बीच भी मिट्टी के दीयों का अपना अलग महत्व बना हुआ है।
योगेन्द्र प्रजापति ने कहा कि दीपावली का त्योहार कुम्हार समाज के लिए भी बेहद खास होता है। मिट्टी के दीये बनाने के लिए कुम्हार परिवार के सदस्य कई दिनों पहले से ही तैयारी में जुट जाते हैं। मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर दीये बनाने, उन्हें सुखाने और पकाने तक में काफी मेहनत लगती है। इसके बाद बाजार में दीयों की बिक्री से उन्हें आमदनी होती है।
कुम्हारों के लिए दीपावली केवल त्योहार नहीं, बल्कि उनकी मेहनत और सालभर की आजीविका से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। दीयों की बिक्री से होने वाली कमाई से उनके परिवार का खर्च चलता है।
ऐसे में दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदना केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि कुम्हारों की मेहनत का सम्मान करने और उनकी पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने का भी एक माध्यम है। लोगों से अपील है कि इस दीपावली मिट्टी के दीये खरीदकर स्थानीय कुम्हारों का सहयोग करें, ताकि परंपरा की यह रोशनी आने वाली पीढ़ियों तक कायम रहे।







